आश्रम…..संसार में तो केवल नश्वर शरीर को पालने का श्रम होता है। लेकिन वो स्थान जहां अपने आत्मा-परमात्मा को प्राप्त करने का श्रम होता है वह एक आश्रम होता है। संसार में लोग खाली अपना जीवन काटने में लगे रहते हैं, लेकिन जीवनमुक्त महापुरुष के आश्रम में तो मानव के 84 का चक्कर, जन्म – मरण का चक्कर काटने का काम होता है। संसार में लोग एक दूसरे का पांव खींचने में रहते हैं, जबकि आश्रम में एक दूसरे को भगवान के रास्ते आगे बढ़ने के लिए धक्का लगाते हैं।
जैसे जड़ के बिना वृक्ष नहीं हो सकता, वैसे ही इन संतों के आश्रमों के बिना सनातन संस्कृति, संपूर्ण मानव सभ्यता की कल्पना असंभव है। जीव को शिव बनाने की फैक्ट्री होते हैं ये आश्रम।
पहले के जमाने में चक्रवर्ती सम्राट भी संतों के आश्रम में झाड़ू- बुहारी करके अपना भाग्य बनाते थे, और आज भी मनुष्य इन संतों के आश्रम में जाते ही असीम शांति का और अलौकिक आनंद का अनुभव करते हैं। ऐसे आश्रमों में जाने मात्र से दर्शन मात्र से लोगों की पुण्यायी बढ़ती है, फलस्वरूप शुभकर्म भी होने लगते हैं | लोगों की हिंसक प्रवृत्ति नष्ट होती है, और दिव्य गुणों का विकास होता है, जिससे समाज में अपराध कम होते हैं।
अतः आज के युग में एक स्वस्थ, सुखी और सम्मानित जीवन की, समाज की अभिलाषा केवल इन वैदिक आश्रमों से जुड़कर ही पूरी हो सकती है। संतों के सत्संग से ही संभव हो सकती है।